जीने का मजा, श्री अमित दुबे द्वारा रचित!
जीने का मजा जब थोड़े मे मन खुश था, तब जीने का मजा ही कुछ और था! नहीं थे जब AC कूलर, तब छत पर सोने का मजा ही कुछ और था! गर्मी की भरी दोपहर मेझरती मटकी का, पानी पीने का वो दौर कुछ और था! रात मे छत पर रखी सुराही का ठंडा पानी, पीने का मजा ही कुछ और था! शाम होते ही छत पर पानी से छत की तपन कम करते, उठी सोंधी खुशबू कैसे भूल सकता है कोई, फिर प्यार से लगाये किसी के बिस्तर पर जाकर, जोर से पसरने का मजा ही कुछ और था! बंद हवा में वो पंखी का झलना, आज भी याद है मगर, ठंडी हवा के पहले झोंके से छायी, शीतलता का मजा ही कुछ और था! चाँद तारों से भरे आसमान को, निहारने का आलम आज कहा नसीब है! ध्रुव तारे और सप्तऋषि से बात करने का, तब मजा ही कुछ और था! बंद कमरों मे अब सुबह हो जाती है, अब तो पता ही नहीं चलता! सूरज की पहली किरण के साथ तब, आँख मिचौली करने का मजा ही कुछ और था! ट्रेड मील पर खड़े खड़े भले ही, कितनेे ही मील क्यो ना दोड ले हम ...