Bloom Taxonomy By Ashwany Dubey
By Ashwany Dubey
🏵️ Bloom Taxonomy 🏵️
👉 1956 मे बेंजामिन ब्लूम ने शिक्षा को ग्रहण और संप्रेषण के संदर्भ मे शैक्षिक उद्देश्यो का मानकीकृत वर्गीकरण किया!
👉शैक्षिक उद्देश्यों का मूल आधार ज्ञान को माना गया क्योकि ब्लूम Taxonomy से यह जान पाते है कि हमे जो भी ज्ञान संप्रेषित करना है उसका क्या अच्छा और कितना उपयोग किया जा सकता है जो कि उसके भाव को पता करके ही ज्ञात किया जा सकता है!
👉 किसी भी विषय के भाव को समझने के लिए हमे उसका ज्ञानात्मक पक्ष जानना उतना ही आवश्यक जितना बेहतर तरीके से हम उसका उपयोग करना चाहते है!
👉ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि विषय वस्तु समझने मे आसान, शुद्ध और क्रमानुसार होनी चाहिए!
इससे यह पता चला कि सीखने या सिखाने के दौरान ज्ञान के बिना भावनात्मक और क्रियात्मक पक्ष का ज्ञान अधूरा है!
🌺 बेंजामिन ब्लूम ने शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु शिक्षा के किसी भी विषय के 3 क्षेत्रों (domain) को दिया :-
1)ज्ञानात्मक क्षेत्र (cognitive domain)
2)भावनात्मक क्षेत्र (pathetic domain)
3)क्रियात्मक क्षेत्र (applicable domain)
✍️ संज्ञानात्मक क्षेत्र:-
🌺 इनमे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ज्ञानात्मक/संज्ञानात्मक क्षेत्र को माना गया क्योकि बिना किसी विषय के ज्ञान के हम उसके सही और गलत प्रयोग का पता नहीं लगा सकते है अर्थात उसमे निहित उसके भाव और भावानुसार उसका प्रयोग का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते है!🌺
🤩संज्ञानात्मक क्षेत्र को 6 भागों मे बांटा गया है जो निम्न है :-
1)ज्ञान(Knowledge) :-
किसी भी विषय का सर्वप्रथम ज्ञान होना आवश्यक है! जो कि सर्वोच्च है!
2)अवबोध /बोध (Understanding/comprehension)
3)प्रयोग /अनुप्रयोग /आवेदन (application)
4)विश्लेषण (Analysis)
5)संश्लेषण (Synthesis)
6)मूल्यांकन (Evaluation)
🌺🌸🏵️ज्ञानात्मक क्षेत्र के इन उप क्षेत्रों को निम्न रूप मे वर्णित किया गया 🌺🌸🏵️
🌸1)ज्ञान:- किसी विषय के बारे मे हमे होना चाहिए
a) विशिष्ट तत्व का ज्ञान
b) शब्दवाली का ज्ञान
c) तथ्यों का ज्ञान
d) संकेतों का ज्ञान
e) परंपराओं का ज्ञान
f) प्रवृति या क्रम का ज्ञान
g) मापदंड या कसौटी का ज्ञान
h) विधि का ज्ञान,
i) वर्गीकरण /श्रेणीकरण करने का ज्ञान
🌸2)अवबोध (understanding) :-
किसी नए ज्ञान के प्रति समझ या ग्रहण करने की कला को स्थापित करना ही अवबोध है!
🌸 3)प्रयोग (application):-
✍️समझ के अनुसार ज्ञान का प्रयोग किसी नयी समस्या के समाधान मे कर सकते है!
🌸4)विश्लेषण (Analysis) :-
✍️प्रयोग करने पर समस्या समाधान से जो परिणाम आए उनके हर पक्ष और भागों का अध्ययन (विश्लेषण)!
🌸5)संश्लेषण (synthesis) :-
✍️विभाजित भागों के अध्ययन मे से क्या सही क्या गलत का एकत्रीकरण और उनका एक निष्कर्ष निकालना!
🌸6)मूल्यांकन (evaluation) :-
✍️इसमे हम प्राप्त परिणाम (निष्कर्ष) का आलोचनात्मक /सर्वोच्चस्तर मापदंड क्रिया से जांच करते है!
👉इन मूल्यांकन के आधार पर हम निर्धारित करते है कि हमारा ज्ञान कितना प्रभावशाली रहा है!
🪕Part - 2- Bloom Taxonomy का भावात्मक क्षेत्र (domain) 🪕
🏵️भावात्मक /सकारात्मक पक्ष :-
✍️इस पक्ष मे बच्चे की अधिगम शैली को भावात्मक रूप से प्रभावित करने वाले कारक कुछ निम्न प्रकार से है :-
👉रुचि /अभिरुचि (Interest) :-
प्रत्येक बच्चे की रुचि पर यह निर्भर करता है कि वो ज्ञान को कैसे ग्रहण करे! विभिन्न रुचि वाले बच्चों के अधिगम शैली मे भी भिन्नता पाई जाती है जो कि ज्ञान यह दर्शाता है कि रुचि ज्ञान को अपने अनुसार भाव प्रदान करती है!
👉 अभिव्रत्ति(Habitual Thinking) :-
यह बच्चे की उस धारणा या अवधारणा पर बल देती है जो उसने पूर्व से निहित है जिसके बल पर वह नए ज्ञान को सीखने और समझने का दृष्टिकोण रखता है! प्रत्येक बच्चे का दृष्टिकोण भिन्न होता है इसीलिए उनमे ज्ञान का स्तर और प्रकृति भी भिन्न पायी जाती है, जो यह दर्शाती है कि अभिवृति ज्ञान को प्रभावित करती है!
👉भावनाए(Emotions):-
भावनाए ही बच्चे मे निहित उसके ज्ञान का सही प्रयोग उसको सिखलाती है और उनकी कार्य क्षमता मे भिन्नता प्रदर्शित करती है जिसके द्वारा प्रत्येक बच्चा व्यक्तिगत भिन्नता को प्रदर्शित करता है!
👉 संवेदना(sensitivity):-
बच्चे का अधिगम के प्रति सक्रीयता का प्रदर्शन करना और किसी भी कार्य मे संवेदनशील होकर उसको पूरा करना ये हर एक बच्चे मे या अधिगम कर्ता मे विषय अनुसार भिन्न होता है!
👉 मूल्य (Values and Ethics) :-
हमारे भावनात्मक पक्ष मे हमारे सिद्धांतों और मूल्यों का बड़ा महत्व है!भाव ही हमे किसी कार्य को करने का सही या गलत होने का बोध कराते है और हमारे मूल्य निर्धारण करने मे सहायता करते है! भिन्न अधिगम कर्ता मे भिन्न भाव के अनुसार भिन्न मूल्यों का प्रदर्शन देखा जाता है!
🌻🌻🌻भावात्मक पक्ष के उद्देश्य के स्तर 🌻🌻🌻
1)अभिग्रहण करना / प्राप्त करना :-
✍️भावनात्मक रूप से किसी भी ज्ञान प्राप्त करने की जो इच्छा, चाह, और उसके प्रति हमारी सच्ची निष्ठा उस ज्ञान की प्राप्ति का मुख्य साधन बनती है जिसे हम अभिग्रहण करना भी कहते है!
2)अनुक्रिया /प्रतिक्रिया /जवाब (Response) :-
✍️जो ज्ञान हम ग्रहण करते है उसके प्रति हमारी प्रतिक्रियाएं और उसके लिए हमारी ओर से उसके संदर्भ मे अपने ज्ञान को प्रदर्शित करते है!
3)मूल्य निरूपण:-
किसी विषय को कितना महत्व देना है इसका आंकलन हमारे ग्रहण करने और प्रतिक्रिया के दौरान ही आती है!
👉इनको दो भागों मे बांटा गया है!
a)मूल्यआकना(judgement):-
किसी अभिगृहीत ज्ञान पर
अपने द्वारा दी गयी प्रतिक्रिया को परखना की जो हम प्रतिक्रिया दिए है वो कितना सही है और महत्वपूर्ण है!
इसके तीन चरण है कि किसी ज्ञान को ग्रहण करके उसको कितना वरीयता देना है उसके प्रति हमे कितना सजग और वचन वद्ध रहना है! ये हमारे उस विषय के साथ भावनात्मक जुड़ाव पर निर्भर करता है!
#ग्रहण #वरियता # वचनबध्दता
ये व्यक्ति की सोच और विश्वास पर अधारित है!
b) मूल्य संधारण :-
हम जब नए ज्ञान को अपने पुराने मूल्यों के आधार पर अपने सन्ज्ञान मे व्यवस्थित करते है उसको भी उतनी ही वरीयता देते है जितना हम अपने पुराने ज्ञान को देते है, लेकिन हम परखते है कि वो हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है! कभी कभी हमे लगता है कि हम किसी विषय को इतना महत्व दे रहे जितना जरूरी नहीं! इसके लिए फिर हम परिवर्तन करते है जिसको मूल्य संधारण कहा जाता है!
4)संगठन करना / आयोजन करना -
इसमे एक ऐसे मूल्यों का संगठन करते है जिसमे हमारे मूल्यों का अंतरद्वंद समाप्त हो जाता है, जिनके आधार पर हम उनके अनुसार आगामी परिस्थिति से समायोजन करने की क्षमता विकसित कर सकते है!
5)निरूपण / चारित्रिकरण (Characterization):-
जिस ज्ञान को हम भावनात्मक क्षेत्र के द्वारा प्राप्त कर अपने अंदर पूर्ण रूप से समाहित कर लेते है उससे जो परिवर्तन हमारे अंदर आते है उनके अनुसार हम सही और गलत प्रतिक्रिया का प्रदर्शन करते है जिससे हमारे व्यवहार मे नियंत्रण आता है!
🌻🌻🌻🌻अधिगम क्षेत्र मे Bloom Taxonomy का क्रियात्मक पक्ष 🌻🌻🌻🌻
✍️ अधिगम द्वारा /अधिगम क्रियाओं द्वारा व्यवहार मे परिवर्तन आना क्रियात्मक क्षेत्र का महत्वपूर्ण कार्य है! ✍️आपका ज्ञान और भाव कैसा है कोई मतलब नहीं आप काम कैसा करते है,आपकी व्यवहार कुशलता, कार्य क्षमता और उसमे कैसा परिवर्तन हो रहा ये देखा जाता है!
👉 परिवर्तन दो प्रकार का हो सकता है! (a) नकारात्मक और (b) सकारात्मक
a) नकारात्मक परिवर्तन :- जब बच्चा कोई की हुयी क्रिया के अनुरूप परिवर्तन नहीं देता और उसमे कोई क्रियात्मक कुशलता का स्तर मे विकास नहीं देखा जाता है!
b) सकारात्मक परिवर्तन :- जब बच्चा की हुयी क्रिया अनुरूप अनुभव के आधार पर व्यवहार कुशलता मे विकास को दर्शाता है तब सकारात्मक डोमेन कहा जाता है!
✍️क्रियात्मक क्षेत्र को इन अन्य नामो से भी जाना जाता है! ✍️
👉मनोक्रियात्मक डोमेन :-
🌸इसमे बच्चे की कार्य कुशलता से उसके मन का अनुमान लगाना मतलब बच्चे के कार्य से उसके मन का पता लगाना!
👉मनोचिकित्सात्मक डोमेन :-
🌸मन के कार्यों द्वारा मन की क्रियाओं और ज्ञान की चिकित्सा/विकास!
👉 मनोगत्यातमक डोमेन :-
🌸जब बच्चा किसी कार्य को वास्तव मे कर रहा हो तो वहा क्रियाए गति मे होती है! जिसे मनोगत्यातमक डोमेन कहते है!
🗯️इस को english मे psychomotor domain भी कहा जाता है!
🗯️ये अधिगम क्षेत्र psycho dynamic domain भी कहलाता है! क्योकि इसमे ज्ञान भाव मे परिवर्तनशीलता क्रियाओं द्वारा देखी जाती है!
🗯️इसको कार्योन्मुख / subjective domain भी कहते है!
🌷🌼क्रिया /कार्य का मुख्य बिंदु व्यवहार और कुशलता मे परिवर्तन लाना है जो कि अंगों और मांसपेशियों की गतिविधि मे प्रशिक्षण को दर्शाता है कि कितनी कुशलता से हम किसी कार्य को करना सीख लेते है काम त्रुटियों के साथ!
🌷🌼 किसी कार्य का स्वयं करके अनुभव प्राप्त करना व्यवहार मे लाना होता है!
✍️इस व्यवहार और कुशलता को प्राप्त करने के लिए ब्लूम ने क्रियात्मक डोमेन के 6 स्तर दिये है :-
1)उत्तेजना/आवेग /impulse /excitation :-
👉 किसी भी क्रिया या काम को शुरूआत करने से पहले उसके लिए हमारे अंदर उत्तेजना जैसे कि आवश्यकता /रुचि/उत्सुकता, ऐसा भाव जिसमे हमे कुछ करके ही रहना है ऐसा सोच जरूरी है! इसको ज्यादातर केस मे लोग बस सोचते रह जाते है आगे नहीं बढ़ पाते है!
2) परिचालन /कार्य करना / आत्मसात्करण :-
👉 जिस कार्य के लिए उत्तेजना का भाव आया उसको क्रियान्वित करने की दिशा मे आगे कदम बड़ाना यहां ध्यान दिया जाता है कि हम भावावेश मे आकर कही अनियंत्रित होकर कार्य को ना करे!
3)नियंत्रण :-
👉 कार्य को करते समय पूर्ण नियंत्रण मे करना और परिचालन को सुचारू रूप से आगे बड़ाना आवश्यक है क्योकि अगर नियंत्रण नहीं रहा तो कार्य के दुष्परिणाम भी हो सकते है!
4)सामंजस्य/समन्वय /परियोजित प्रक्रिया :-
👉किसी भी कार्य को उसके विभिन्न भागों मे करना और सुनिश्चित करना की किस भाग को किस समय और कितना समय देकर करना है कौन ज्यादा वरीयता रखता है इन सबके तालमेल को बनाए रखना ही सामंजस्य है! सामंजस्य और स्वाभाविक क्रिया तभी होगी जब परिचालन नियंत्रण मे होगा!
6)अनुकूलन /Adaptation /Naturalization :-
👉 किसी कार्य को करने मे जब हमारी मांसपेशियां और अंग अभ्यषथ हो जाते है और जब हम उत्तेजना के नियंत्रित परिचालन करके सामंजस्य स्थापित करते है तब कार्य को करने मे हमे कोई परेशानी नहीं होती इसको हम अनुकूलन भी कहते है!
6)आदत निर्माण, उत्पत्ति, आदत गठन :-
👉 जब अधिगम करने मे किए हुए कार्य को हम अनुकूलित कर लेते है और उसको सहजता मे लाते है तो वहां हम एक ऐसे संवेग को समझने लगते है कि ये काम हमारे लिए जरूरी इसको नहीं किए तो कुछ अधूरा है मतलब वो कार्य को करने की क्रिया हमारे अचेतन मन मे विकसित हो चुकी है जिसको हम आदत निर्माण और आदत गठन कहते है!
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