Jean piaget by Vaishali mishra

 🔆जीन पियांजे के अन्तर्गत आने वाली कुछ terms🔆

बच्चो के बौद्धिक विकास के लिए


◼️अनुकूलन(Adaptation)➖वातावरण के साथ समायोजन की जो प्रकृति है वहीं अनुकूलन कहलाती है।इस परिस्थिति में हम अपने आप को ढाल लेते है।

बच्चे ने वातावरण के साथ समायोजन करने की प्रवृति जन्म से ही आ जाती है अर्थात बचा जैसे ही जन्म लेता है उसमे समायोजन की प्रवृति विकसित होने लगती है।

जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके सामने कई तरह के उदीपक होते है जैसे भूख , प्यास आदि इन्हीं उदिपक से उन्हें पुनरबलन मिलता है। बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता जाता है उसमे नए नए उदीपक आते जाते है जैसे इच्छा जाग्रत होना, जरुरते होना आदि।

साधारण रूप से जन्म लेने के बाद जो भी नई नई परिस्थितिया आती है उन्हें हम वातावरण के साथ अपनी जरूरतों के हिसाब से  समायोजित करने या अनुकूलित करने लगते है ।

हम अपनी शारीरिक अनुकूलता को मानसिक अनुकूलता के द्वारा बदल सकते है।

अनुकूलन - बाहरी रूप से जो भी प्रक्रिया या स्थिति है ,उस प्रक्रिया या स्थिति को अपने अंदर ढालने की प्रक्रिया ही अनुकूलन कहलाती हैं।


वातावरण के साथ हम अपने आप को संगठित करते है और इन सगठन से हमे अनुकूलन प्राप्त होता है यह अनुकूलन बाहरी होता है।जबकि इसके विपरित  जब  हम अपने आप को आंतरिक रूप से संगठित करते है या अनुकूलित करते है तो हम वातावरण के साथ संगठित हो जाते है। 

उदहारण के तौर पर के जैसे हम ज्ञान को लेते है तो उसे हम बाहरी रूप से प्राप्त करते है  तब वह संगठित रूप में होता है लेकिन जब हम उस ज्ञान को  आंतरिक रूप से ग्रहण कर लेते है तो बह हमारे लिए अनुकूलित हों जाता है।



यदि हम अपने शरीर से  अनुकूलित हो जाते है तो हम अपने मन और मस्तिष्क से भी अनुकूलित हो जाते है।


🔅अनुकूलन के प्रकार➖

1 आत्मसात्करण(Assimilation)

ऐसी प्रक्रिया जिसमे बालक  किसी समस्या का समाधान करने के लिए पूर्व से ज्ञात ज्ञान के द्वारा उस समस्या जा समाधान करता है,यही आत्मसात्करण  कहलाता है।

हम नए अनुभव को आत्मसात करने के लिए पुराने अनुभवों का सहारा लेते है।

जब हमे कोई चीज या कोई कार्य का सही तरीका पहले से ज्ञात होता है तो यदि ज्ञात के आधार पर अपने कार्य को सही प्रकार से पूरा करते है।


◼️2 समंजन(Accomodation)➖ ऐसी प्रक्रिया जो पूर्व में सीखी योजना के काम न चलने पर सामंजस्य स्थापित करने के लिए  की जाती है वहीं समंजन कहलाती है ।

जैसे यदि हमे किसी कार्य को सही प्रकार से करना है या किसी समस्या का समाधान करना है और हमे उस समस्या के बारे में पहले से कुछ भी नहीं पता है और  हम समाधान निकालने के लिए  अपने आप को उसके साथ समायोजित  कर लेते है।


हम आत्मसात्करण ओर समंजन को बेहतर रूप से इस उदहारण के माध्यम से समझ सकते है

जैसे कोरोना के समय में हमारे क्षेत्रों में लॉक डाउन लगा हुआ है।जब हम लॉक डाउन से पहले के समय में अपना जीवन व्यतीत करते थे तो वह एक तरह से आत्मसात्करण ही थी लेकिन लॉक डाउन की स्थिति में हम अपने जीवन को इस परिस्थिति के साथ समंजन स्थापित कर रहे है।


जब हम चीजों का समंजन  करने लगना सीख जाते है तो वह चीजे हमे धीरे धीरे आत्मसात होने लगती है।


◼️संज्ञानात्मक संरचना( cognitive structure)➖

हमारे जो भी मानसिक संगठन , प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, चिंतन या जो भी तर्क होते है वे सभी संज्ञानात्मक संरचना में ही आते है।


◼️मानसिक संक्रिया (Mental operation)➖

जब हमारे पास कोई समस्या होती है तो उसके समाधान के लिए हम चिंतन और चिंतन करने के लिए अपनी मानसिक संक्रियाओ को प्रयोग में लाते है।

◼️ स्कीम (Schemes) ➖

समस्या के समाधान के लिए हम मानसिक सांक्रिया को प्रयोग में लाते है,इन्हीं मानसिक साक्रिया में समाधान खोजने के लिए हम योजना बनाते है और उसी योजना के आधार पर उस समस्या के समाधान को प्रदर्शित करते है।


◼️ स्कीमा (Schema)➖किसी समस्या समाधान  के लिए

जो भी हमारे द्वारा मानसिक सक्रिया  में योजना बनाई गई है उनका समाधान के रूप में प्रदर्शन करने के बाद  जब हम उस समस्या का सामान्यीकरण विकसित कर लेते है या उसका एक सामान्यीकरण नियम बना लेते है।


◼️ साम्यधारण (Equilibrium)➖

जब हम किसी कार्य या किसी चीज के प्रति अपने आप को आत्मसात और समंजन के बीच संतुलन कायम कर लेते है तो यही साम्य धारण कहलाता है।

एक बच्चा जब जन्म लेता है तो उसके बाद से ही वह वातावरण के साथ आत्मसात और समंजन के बीच संतुलन रखने का कार्य करता है।


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