शिक्षण अधिगम प्रक्रिया by Ashwany Dubey and Vaishali Mishra
🔆शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया🔆
▪️हम शिक्षण को ज्ञान और कौशल के संप्रेषण के रूप में देखते हैं।
🔅ज्ञान और कुशलता -
यदि हम अपने सीखे हुए ज्ञान को एक real implementation या उसमे वास्तविक बदलाव कर लेते है तो वहीं कुशलता कहलाती है।
▪️यदि बच्चे से practically कोई काम करवाकर सिखाया जाए फिर उस काम का या उस ज्ञान का implementation किया जाएगा तभी ज्ञान से कुशलता तक जाने की अधिगम प्रक्रिया पूर्ण होगी।
▪️इस प्रक्रिया में सिखाने वाला - सीखने वाले को प्रभावित करता है।, सीखने वाला इसलिए प्रभावित होता है है क्योंकि सीखने के प्रति रुचि, अभिप्रेना की भावना जागृत होती है , और वह उस समय सिखाने वाले (शिक्षक) के व्यक्तित्व, भाव,विचार या उसकी सोच ।सीखने वाले (छात्रों) को ज्यादा प्रभावित कर जाते है।
यदि शिक्षक और छात्र एक दूसरे से प्रभावित या जुड़े नहीं होंगे तो अधिगम कार्य कभी सही नहीं हो पाएगा।
▪️शिक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे सिखाने वाला (शिक्षक) सीखने वाले(छात्र) के लिए विभिन्न परिस्थिती या माहौल या वातावरण में विभिन्न साधनों और विधियों का प्रयोग कर या निर्माण कर अपने शिक्षण कार्य का सही उद्देश्य प्राप्त कर पाते है।
*शैक्षिक या ज्ञान का वातावरण शिक्षक व छात्र दोनों के द्वारा ही विकसित किया जाना चाहिए।
▪️शिक्षण का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक सीखने वाला नहीं सीख जाता और उसके व्यवहार में वांछित परिवर्तन नहीं हो जाता।
यदि हम बच्चो को सीखना चाहते है तो उसे शिक्षा से जुड़ा हुआ माहौल या वातावरण दे और छात्रों द्वारा भी वह माहौल वातावरण बना रहना चाहिए ,तभी हम बेहतर और पूर्ण रूप से सीखा पाएंगे।
🔅 शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया है
इसमें हम शिक्षण को सभी के योगदान से , सक्रिय होकर सामाजिक रूप से आगे बढाते है।
" शिक्षण को कई आधारो में बांटा गया है"
🔅उद्देश्य की दृष्टि के आधार पर➖
(1) ज्ञानात्मक - यह हमारी बौद्धिक ज्ञान,समझ ,सोच विचार को अपने जीवन में जोड़ने का एक आधार है।
(2) क्रियात्मक - यह हमारे ज्ञान को शारीरिक और मानसिक रूप से अपने कार्यों में प्रयोग लाने का एक आधार है।
(3) भावनात्मक- जो भी ज्ञान का हम प्रयोग किए है या कार्य में लाए है वह ज्ञान भावनात्मक रूप से या पूरे मन से बच्चो के साथ जुड़ा हुआ होने का आधार है।
▪️यदि आपके पास ज्ञान है लेकिन उस ज्ञान का प्रयोग या उस पर कार्य नहीं क्या गया है तो उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।
और यदि आपके पास ज्ञान है और आप उस ज्ञान का प्रयोग भी किए लेकिन यह ज्ञान आपके भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ा हुआ है तो हमारा उद्देश्य (ज्ञान को सीखना) कभी पूरा नहीं हो पाएगा।
यदि हम अपने गया पर कार्य करे और वह भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ होगा तब हमारा उद्देश्य निश्चित ही पूरा हो जाएगा।
🔅 स्तर के दृष्टि के आधार पर➖
(1) स्मृति स्तर - जो भी हम सीखना चाहते है वह पूर्ण रूप से स्मृति में रखा जाए।
(2) बोध स्तर- जो भी सीखा हुआ ज्ञान हमारी स्मृति में है उस ज्ञान की समझ भी होना काफी जरूरी है ।
हम अपने स्मृति के ज्ञान की समझ को किसी परिस्थिति में बेहतर रूप से समझ भी पाए।
(3) चिंतन - जो भी ज्ञान हमारी स्मृति में बैठ गया है, उसे समझते हुए उस पर चिंतन करके उस ज्ञान को और निखारा जा सकता है।
✍🏻 वैशाली मिश्रा
✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया✍️
शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, जो सीखने वाले मे उक्त प्रक्रिया द्वारा दिखायी देते है!
1)ज्ञान(किसी भी क्रिया को करने का तरीका और क्रिया के चरणों का हमारे मष्तिष्क मे स्थान होना या हमारी स्मृति मे समझ के अनुसार उसका स्थायित्व होना!)
2)कौशल ( किसी भी क्रिया या कार्य के प्राप्त ज्ञान का उपयोग करने की योग्यता को कौशल कहते है)
✍️ ज्ञान एवं कौशल का संबंध परस्पर एक दूसरे से होता है! ज्ञान से ही हम कौशल करने के योग्य बनते है और कौशल से ही ज्ञान का स्थायित्व और उसके प्रभाव का हमे पता चलता है!
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✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया मे शिखाने वाले को चाहिए कि वो एक प्रभावशाली वातावरण का निर्माण करके ज्ञान का संप्रेषण शिक्षार्थियों के समक्ष करे, और शिक्षार्थियों को भी ये चाहिए कि वे निर्मित वातावरण मे समायोजन करके ज्ञानार्जन करे!
✍️शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का कोई महत्त्व नहीं है जब तक कि अधिगम कर्ता शिक्षा को पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं करलेता है, अर्थात उसके व्यवहार मे अधिगम पश्चात वांछनीय परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है!
✍️अगर जिस अधिगम की योजना बनाकर शिक्षक अपने ज्ञान का संप्रेषण कर्ता है और अधिगम कर्ता मे और अधिगम कर्ता के व्यवहार मे वांछनीय परिवर्तन दिख जाता है तो वहां शिक्षण एक सार्थक क्रिया के रूप मे समझा जाता है!
✍️शिक्षण एक सामाजिक प्रक्रिया भी है जिसमे समाज के विभिन्न पहलुओं का योगदान होता है जिनकी सहायता से अधिगम सुगम रूप से संचालित होता है!✍️
शिक्षण प्रक्रिया को दो रूपों मे बांटा गया है!
1)शिक्षण के उद्देश्य
2)शिक्षण के स्तर
1)शिक्षण के उद्देश्य - इसका मतलब है कि हमे क्यो शिक्षण ग्रहण करना है ये विचार हमारे मष्तिष्क मे बिना किसी उलझन के स्थिर होनी चाहिए!
इसके भी 3 पक्ष है जो कि निम्न है
👉) ज्ञानात्मक पक्ष
👉) क्रियात्मक पक्ष
👉) भावात्मक पक्ष
👉) ज्ञानात्मक पक्ष के अंतर्गत हम ये समझ सकते है कि हम को किसी वस्तु, क्रिया, या स्थान का स्मृति है उसकी मानसिक समझ है लेकिन हमने उस मानसिक समझ का कभी प्रयोग नहीं किया!
👉) क्रियात्मक पक्ष के अंतर्गत जो ज्ञान हम अर्जित करते है उसका प्रयोग मे लाना उसकी मदद से अपने कार्यों और जीवन संबंधी समस्याओं का समाधान करना!
👉) भावनात्मक पक्ष के अंतर्गत वो क्रियाएं आती है जिनमे हम अपने ज्ञान एवं क्रिया को एक समर्पण भाव से करते है!
2) शिक्षण के स्तर - शिक्षण के स्तर का निर्माण ज्ञान के अधिगम की विभिन्न क्रियाओं द्वारा हुआ है!
जो कि निम्न प्रकार है
👉) स्मृति स्तर
👉) बोध स्तर
👉) चिंतन स्तर
👉स्मृति स्तर - इस स्तर मे मष्तिष्क द्वारा किसी मूर्त ज्ञान को अमूर्त स्थायित्व मे लाना, अर्थात किसी ग्यान को स्थिर रखना स्मृति है!
👉) बोध स्तर - इस स्तर मे प्राप्त ज्ञान का स्थायित्व समझ और भावनाओं के सहसम्बंध के साथ होना बोध स्तर को दर्शाता है!
👉) चिंतन स्तर - इस स्तर मे शिक्षार्थी के मन मष्तिष्क मे स्मृति, बोध के साथ किया गया चिंतन शिक्षार्थी को रचनात्मकता की और प्रेरित करता है और रचनात्मक कौशलो की व्रद्धी करता है!
👉यहा हम निष्कर्ष दे सकते है कि ज्ञान और कौशलों को संप्रेषित करने की क्रिया ही अधिगम कह लाती है! 👈
ASHWANY DUBEY
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